सोमवार को देर शाम अमेरिका पहुंचे पीएम नरेंद्र मोदी की आक्रामक कूटनीति को मंगलवार को उस समय जबरदस्त सफलता मिली, जब मिसाइल तकनीकी नियंत्रण और हस्तांतरण से जुड़े समूह मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में भारत के शामिल होने का रास्ता साफ हो गया। यह मोदी के नेतृत्व में भारतीय कूटनीति की एक बड़ी सफलता है। जहां भारत एमटीसीआर का 35वां सदस्य बनने वाला है, वहीं इस महीने एनएसजी की बैठक में भारत की स्थिति भी मजबूत हो गई है।

विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक 34 सदस्यीय एमटीसीआर में भारत के पूर्णकालिक सदस्य होने की घोषणा अब सिर्फ औपचारिकता भर रह गई है। अमेरिकी प्रशासन की तरफ से भी यह कहा गया है कि भारत के इस प्रतिष्ठित संधि में शामिल होने की घोषणा इस साल के अंत में होगी। इसके लिए 34 देशों का यह समूह इस साल के आखिर में सियोल में बैठक करेगा। आयरलैंड में नार्वे के राजदूत रोल्ड नेस ने ट्वीट करके बताया कि भारत का मिशन पूरा हुआ। अब प्रक्रिया संबंधी कुछ औपचारिकताएं रह गई हैं।

भारत के एमटीसीआर में शामिल होने की खबर तब आई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और पीएम मोदी व्हाइट हाउस में द्विपक्षीय वार्ता कर रहे थे। परमाणु व मिसाइल तकनीकी के हस्तांतरण व नियंत्रण से जुड़े चार अहम समूहों में भारत शामिल होने की कोशिश पिछले एक दशक से कर रहा है। लेकिन यह पहला मौका है, जब उसे किसी एक समूह में शामिल होने में सफलता मिली है।

एमटीसीआर के सदस्य देशों को इस समूह में भारत के शामिल होने के आवेदन के खिलाफ सोमवार (06 जून, 2016) तक आपत्ति पेश करना था। लेकिन इसके 34 सदस्यों में से किसी ने ऐसा नहीं किया। इस तरह से भारत इसका सदस्य बन गया है।

सदस्य देशों को देनी होगी मिसाइल तकनीक की जानकारी

एमटीसीआर में शामिल होने के बाद भारत को अपनी मिसाइल तकनीक व प्रक्षेपण से जुड़ी हर जानकारी सदस्य देशों को देनी होगी। हालांकि विदेश मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि इससे देश में अगले चरण के मिसाइल विकास कार्यक्रम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि यह संधि किसी देश पर कोई कानूनी बाध्यता लागू नहीं करती है। लेकिन सदस्य बनने के बाद भारत की जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। भारत के लिए दूसरे देशों से मिसाइल तकनीक को हासिल करना आसान हो जाएगा। लेकिन अगर भारत किसी दूसरे देश को ऐसी कोई तकनीक बेचता है या उसका कारोबार करता है तो उसकी पूरी जानकारी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को देनी होगी।

हथियार निर्यातक देश बनेगा भारत

रूस की मदद से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस बना चुका भारत इस समूह में शामिल होने के बाद पहली बार अहम हथियार निर्यातक देश बन सकेगा। हालांकि इसके बाद भारत अधिकतम 300 किमी मारक क्षमता वाली मिसाइल ही तैयार कर सकेगा। ताकि हथियारों की होड़ को रोका जा सके।

जानकारों के मुताबिक भारत एनएसजी और एमटीसीआर के अलावा वासेनार एरेंजमेंट और ऑस्ट्रेलिया समूह का भी हिस्सा बनने को उत्सुक है। लेकिन एमटीसीआर का सदस्य बनने से भारत के लिए एनएसजी की सदस्यता हासिल करने में आसानी होगी।

सात बड़े देशों ने किया था एमटीसीआर का गठन

एमटीसीआर का गठन वर्ष 1997 में दुनिया के सात बड़े विकसित देशों ने किया था। बाद में 27 अन्य देश भी इसमें शामिल हुए हैं। वर्ष 2008 में इस समूह के लिए भारत के आवेदन पर इटली ने आपत्ति की थी। लेकिन इटली के नौसैनिकों को छोड़े जाने के बाद इस बार इटली ने कोई आपत्ति नहीं जताई।

यह है एमटीसीअार

1987 में समूह सात देशों सहित 12 विकसित देशों ने मिलकर अाणविक हथियार से युक्त प्रक्षेपास्त्रों के प्रसार को रोकने के लिए एक समक्षौता किया था जिसे मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर) कहते हैं।

अप्रैल 1987 में स्थापित स्वैच्छिक एमटीसीआर का उद्देश्य बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र तथा अन्य मानव रहित आपूर्ति प्रणालियों के विस्तार को सीमित करना है जिनका रसायनिक, जैविक और परमाणु हमलों में उपयोग किया जा सकता है। ओबामा के समर्थन के बाद 34 देशों के एमटीसीअार में भारत का प्रवेश फाइनल हो गया है। एमटीसीअार में शामिल होने के बाद भारत हाई-टेक मिसाइल का दूसरे देशों से बिना किसी अड़चन के एक्सपोर्ट कर सकता है और अमेरिका से ड्रोन भी खरीद सकता है।

PM मोदी की कूटनीति को मिली सफलता, MTCR का सदस्य बना भारत

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