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किसी नौकरी में आवेदन, परीक्षा या इंटरव्यू के बाद भी जाति प्रमाण पत्र दिया जाए तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति जन्म से आरक्षित वर्ग से हैं तो उसे जारी जाति प्रमाण पत्र केवल इस तथ्य की स्वीकरोक्ति भर है।
सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का यह हवाला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने इंडियन ओवरसीज बैंक में चयन के बाद ओबीसी सर्टिफिकेट नहीं दे पाने की वजह से चयन खारिज करने के बैंक के निर्णय को बदल दिया है। जस्टिस श्री नारायण शुक्ला और जस्टिस अनंत कुमार की खंडपीठ ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र अंतिम तारीख के बाद भी जमा जा सकता है।

याचिका में शुभम ने बताया कि कई इंटरव्यू के दौरान चुने गए 37 अभ्यर्थी जरूरी दस्तावेज नहीं दे पाए थे, उन्हें बाद में दस्तावेज जमा कराने का मौका दिया गया लेकिन शुभम के मामले में पूरी तरह भेदभाव बरता गया। याचिका के जवाब में बैंकों ने आईबीपीएस के नियमों का हवाला देकर अपने निर्णय को सही बताया।

उन्होंने बताया कि इसी तरह के एक और मामले में हाईकोर्ट 3 मार्च 2014 को एक याचिका खारिज कर चुकी है, जिसमें अभ्यर्थियों ने इंटरव्यू के लिए न चुने जाने पर सवाल उठाया था।

एक अन्य याचिकाकर्ता शैलेंद्र कुमार प्रजापति की याचिका भी 9 अप्रैल 2014 को खारिज कर दी गई, जो इंटरव्यू के दौरान जाति प्रमाण पत्र नहीं दे पाए थे। उस निर्णय में कहा गया था कि विज्ञापन में निर्धारित निर्देशों सख्ती से पालन होना चाहिए। मौजूदा याचिका को भी इसी आधार पर खारिज करने की बात बैंकों द्वारा कही गई।

सुप्रीम कोर्ट के दो केस सामने रखे गए
– बैंकों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में बेडांगा तालुकदार व सैफुदुल्लाह खान केस का उदाहरण दिया गया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विज्ञापन में तय नियमों में कोई छूट नहीं दी जा सकती। नियमों में कोई भी बदलाव बिना विज्ञापन निकाले नहीं किया जाना चाहिए, ऐसा किया जाता है तो समानता के अधिकार का हनन हो सकता है।

– दूसरी ओर याचिकाकर्ता के वकील द्वारा रामकुमार गिजरोया व दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड के मामले को सामने रखा गया, जिसमें कहा गया कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हाेंने जाति प्रमाण पत्र देरी से दिया।

 

हाईकोर्ट ने द‌िया जात‌ि प्रमाणपत्र से जुड़ा ये अहम फैसला

| उत्तर प्रदेश, लखनऊ | 0 Comments
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