bangladeshi_muslims_25_08_2016

आज के समय में जब पूरी दुनिया धर्म और भाषा की खेमेबाजी में बंट रही है। मगर ये जानना आश्चर्यजनक हो सकता है कि एक समय ऐसा भी था जब मुस्लिमों की बहुसंख्य आबादी ने उर्दू को नकारते हुए संस्कृत और बंगाली को अपनी भाषा चुना था।

तब लाखों मुसलमानों ने हिंदुओं की भाषा समझी जाने वाली संस्कृत और बंगालियों की भाषा मानी जाने वाली बंगाली को अपनी राष्ट्रभाषा चुनने के लिए बाकायदा आंदोलन किया।

किस्सा कुछ यूं था कि सन् 1947 में धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा हुआ और मुस्लिम बहुल जनसंख्या के आधार पर पाकिस्तान को दो भागों पूर्वी (अब बांग्लादेश) और पश्चिमी (अब पाकिस्तान) के रूप में एक देश का दर्जा दिया गया।

मगर पाकिस्तान के इन दोनों हिस्सों के लोग भौगोलिक, वैचारिक, भाषाई, रहन-सहन और जीवनशैली में अलग थे। पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमान खुद को वैचारिक रूप से श्रेष्ठ, उन्न्त और पढ़ने-लिखने वाला मानते थे, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान के लोग हिंसा, मारकाट और राजनीतिक उठापटक में यकीन रखते।

ऐसे में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने अपनी राजनीतिक आजादी के साथ भाषाई आजादी के लिए भी आंदोलन शुरू किया। इसमें हजारों की संख्या में मुसलमान संस्कृत और बंगाली में लिखे बैनर लेकर सड़कों पर उतरते और उर्दू को राष्ट्रभाषा बनाने का विरोध करते।

आखिरकार विरोध रंग लाया और पाकिस्तान के हुक्मरानों को झुकना पड़ा। पूर्वी पाकिस्तान (बाद में बांग्लादेश बना) के लोग सभी मुसलमानों, बंगालियों और हिंदुओं के लिए समान भाषा अधिकार लेकर ही माने।

हमें उर्दू नहीं संस्कृत और बंगाली चाहिए

| उत्तर प्रदेश | 0 Comments
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