सपा में चल रहे विवाद के बीच मुलायम सिंह यादव और अखिलेश ने 3 घंटे मीटिंग की। बताया जा रहा है कि पिता-पुत्र की बातचीत सही ट्रैक पर थी लेकिन जैसे ही शिवपाल पहुंचे, मामला बिगड़ गया। अखिलेश लौट गए। बाद में रामगोपाल यादव ने कहा- सुलह नहीं होगी। अखिलेश की अगुआई में ही चुनाव लड़ेंगे। सिंबल का फैसला इलेक्शन कमीशन करेगा। वहीं, आजम खान बोले- सुलह अब भी हो सकती है। दूसरी ओर, माना जा रहा है कि चुनाव आयोग सपा के साइकल सिंबल को फ्रीज कर दोनों गुटों को अलग-अलग सिंबल दे सकता है। अखिलेश की चार शर्तें क्या…

सूत्रों के मुताबिक, मुलायम से मीटिंग के दौरान अखिलेश ने चार शर्तें रखीं। 1. अमर सिंह को बर्खास्त किया जाए। 2. शिवपाल को राष्ट्रीय राजनीति में भेजा जाए। 3. टिकट बांटने का काम सिर्फ दो लोग करें, अखिलेश और मुलायम। 4. अखिलेश खेमे के बर्खास्त लोगों की फौरन वापसी हो।

शिवपाल आए और बिगड़ गई बात

सूत्रों के मुताबिक, 3 में से शुरुआती एक घंटे में मुलायम अखिलेश से सहमत थे। बाद में शिवपाल की एंट्री हुई। अमर सिंह को हटाने की शर्त शिवपाल ने नकार दी। इसके बजाए रामगोपाल को बाहर करने की बात पर अड़ गए।

– कहा तो ये भी जा रहा है कि रामगोपाल शिवपाल को राष्ट्रीय राजनीति में एक्टिव करने के पक्ष में भी नहीं हैं। अमर और रामगोपाल का विवाद कई साल पुराना है।

मौके का फायदा उठाने की कोशिश में रामगोपाल और अमर सिंह
– कार्यकर्ताओं में इस बात की चर्चा है कि अमर सिंह और रामगोपाल यादव के पुराने विवाद का ही परिणाम है कि पिता-पुत्र में सुलह नहीं हो पा रही।
– कहा जा रहा है कि रामगोपाल सांसद बेटे अक्षय को अखिलेश के सहारे आगे लाना चाहते हैं। जबकि, अमर मुलायम के सहारे पार्टी में पुराना वजूद तलाश रहे हैं।

अखिलेश अपना सकते हैं मोटरसाइकिल सिंबल

– सूत्रों के मुताबिक, मुलायम ने अमर सिंह को चुनाव आयोग जाने और रामगोपाल के खिलाफ ज्ञापन देने को कहा।

– सूत्रों की मानें तो अगर अखिलेश को ‘साइकिल’ चुनाव चिह्न नहीं मिलता है तो वे मोटरसाइकिल को सिंबल के तौर पर अपना सकते हैं।

– रामगोपाल ने चुनाव आयोग को बताया, ‘अखिलेश यादव को 90% एमएलए का सपोर्ट हासिल है। वे ही पार्टी को लीड कर रहे हैं। लिहाजा इस धड़े को ही सपा मानना चाहिए।’

अखिलेश खेमा बोला- हमारे साथ 90% मेंबर, सिंबल मायने नहीं रखता
– अखिलेश खेमे के एमएलसी राजपाल कश्यप का कहना है, ‘रविवार को जो अधिवेशन बुलाया गया था, उसमें अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के प्रस्ताव पर 90% लोगों ने दस्तखत किए। हम साइकिल सिंबल अपने पास रखेंगे। अखिलेश अपने आप में सिंबल हैं। चुनाव में जिसके पास लोगों का सपोर्ट होता होता है, वही मायने रखता है।’
– वहीं, किरणमय नंदा का कहना है, ‘पार्टी सिंबल बड़ी चीज नहीं है। हमारे पास सबकुछ है। हम नेताजी से अलग नहीं, बल्कि उनके साथ हैं।’

क्या चुनाव से पहले सपा सिंबल विवाद सुलझ सकता है?
– इसकी संभावना काफी कम है। क्योंकि इलेक्शन कमीशन की सुनवाई काफी लंबी और विस्तृत होती है। इसमें कम से कम 6 महीने का वक्त लगता है।
– इसको देखते हुए आयोग पार्टी के सिंबल को फ्रीज कर सकता है और दोनों धड़ों को एक ही नाम से टेम्परेरी चुनाव चिह्न दे दिया जाएगा।
– 1979 में Congress (I) और Congress (U) जैसे दो गुटों और 1980 में बीजेपी और जनता पार्टी को चुनाव आयोग ने इंटरिम ऑर्डर के तहत मान्यता दी थी। लिहाजा, सपा के दोनों गुटों को मान्यता मिल सकती है।

सही ट्रैक पर थी मीटिंग , शिवपाल के आते ही बिगड़ी बात

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