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राज्य में जल संकट गहराता जा रहा है। सरकार का अंदाजा है कि राज्य के करीब 66 फीसद लोग आंशिक या पूर्ण रूप से पानी की आपूर्ति के लिए नर्मदा पर निर्भर हैं। इसके बावजूद पानी की किल्लत कम होने का नाम नहीं ले रही है।

ऐसे में प्रदेश सरकार एक बार फिर समुद्र के खारे पानी को मीठे पानी में बदलकर लोगों की शुद्ध पेयजल की मांग को पूरा करने पर विचार कर रही है। इसके लिए कई स्थानीय और जापानी कंपनियों ने डीसैलिनेशन योजनाओं में दिलचस्पी दिखा रही हैं।

समुद्र तट पर खारे पानी को मीठे पानी में तब्दील करने वाले प्लांट लगाने के लिए नई नीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है। ये प्लांट खासतौर पर सौराष्ट्र और कच्छ में स्थापित किए जाने की योजना है। सरकार का मानना है ये प्लांट्स प्रदेश में पानी की कमी को दूर करने का सबसे नया समाधान होंगे और इससे नर्मदा नदी पर बोझ कम हो सकेगा।

राज्य में जल आपूर्ति मंत्री विजय रूपानी का कहना है कि पानी के नए स्रोत तलाशना जरूरी है। नर्मदा नदी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता सही नहीं है।

फिलहाल, अहमदाबाद, वडोदरा, राजकोट, भावनगर, जामनगर साहित कई प्रमुख शहर, 33 जिलों में से करीब 22 जिले, 157 तालुका और 157 नगर पालिका, 8,139 गांव पूरी तरह से पानी के लिए नर्मदा पर निर्भर हैं।

इसलिए डीसेलिनाइजेशन प्लांट्स को समुद्र तटीय इलाकों में स्थापित करने की योजना है। उन्‍होंने कहा कि डीसैलिनेशन के जरिए औद्योगिक मांग को भी पूरा किया जा सकेगा।

कई निजी कंपनियां भी इन योजनाओं में दिलचस्पी दिखा रही हैं। देश के कई हिस्सों और अन्य देशों में डीसैलिनेशन प्लांट जल आपूर्ति का प्रमुख जरिया हैं। चेन्नै में इन प्लांट्स के जरिये लोगों को मीठे पानी की आपूर्ति कराई जा रही है।

समुद्र की मदद से गुजरात में पानी की कमी दूर करने पर विचार कर रही सरकार

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