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पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की पत्नी कमला आडवाणी की आधी अस्थियां हरकी पैड़ी से ऋषिकेश ले जाने पर तीर्थ पुरोहितों ने नाराजगी जताई है।

पुरोहितों की कई संस्थाओं ने परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि को चेतावनी दी है कि वे बार-बार गंगा और हरिद्वार की मान्यताओं से खिलवाड़ करने से बाज आएं। जिस गंगा का आगमन ही सगर पुत्रों की राख बहाने के लिए हुआ, उस गंगा को भी चिदानंद ने अपमानित किया है।

अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीकांत वशिष्ठ ने कहा कि स्वामी चिदानंद कमला आडवाणी की कुछ अस्थियां छल करके ऋषिकेश स्वर्गाश्रम स्थित अपने परमार्थ निकेतन आश्रम ले गए।

स्वामी चिदानंद ने वहां गड्ढा खोदकर अस्थियों पर पेड़ लगवाने की शास्त्र विरुद्घ परंपरा शुरू की। हरकी पैड़ी पर अस्थियां लाने के बाद वापस नहीं ले जाई जाती। उन्होंने कहा कि स्वामी चिदानंद ने पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को गुमराह किया। उन्होंने स्वामी चिदानंद को चेतावनी है कि वे हिंदू शास्त्रों के विपरीत आचरण से बाज आएं।

हरकी पैड़ी प्रबंधकारिणी संस्था गंगा सभा के महामंत्री रामकुमार मिश्रा ने कहा कि मुनि महाराज ने शाकाहारी वृक्षों को भी अस्थियां डालकर मांसाहारी बना दिया है। यह महापाप है। गंगा का आगमन अस्थियों के लिए हुआ है और प्रतिदिन हजारों यात्री हरकी पैड़ी अस्थि प्रवाह करते हैं।

प्रयाग आदि अन्य तीर्थों पर भी गंगा में अस्थियों डाली जाती हैं। चिदानंद मुनि का यह कहना सरासर गलत है कि गंगा में अस्थि विसर्जन बंद कराने के लिए अस्थियों पर पेड़ लगाने का विकल्प खोजा गया है। उन्होंने कहा कि गंगा अनादिकाल से अस्थि प्रवाह होता आया है और होता रहेगा।

युवा तीर्थ पुरोहित महासभा ने भी जताई नाराजगी
अस्थियां ऋषिकेश ले जाने पर अखिल भारतीय युवा तीर्थ पुरोहित महासभा ने भी इसपर नाराजगी जताई है। संस्था की बैठक में स्वामी चिदानंद की निंदा की। महासभा के महामंत्री सुमित श्रीकुंज ने कहा कि चिदानंद हरकी पैड़ी अस्थि प्रवाह बंद कराना चाहते हैं। उन्होंने पिछले कुछ वर्ष से अपने आश्रम में अस्थि प्रवाह शुरू करा दिया है।

यह कृत्य राजा भगीरथ और कपिल मुनि का अपमान है। बैठक की अध्यक्षता पुरोहित सौरभ शिवपुरी और संचालन अंकुर पालीवाल ने किया। बैठक में पंडित प्रणव, अनिमेश, सुभिक्षित रमन आदि ने विचार रखे।

लालकृष्ण आडवाणी की पत्नी की अस्थियों पर संतों ने किया ‘बवाल’

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