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चेन्नई। दुष्कर्म के एक मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि यह अपराध किसी महिला के ‘जीवन के अधिकार’ का उल्लंघन करता है। यह निःसंदेह महिला की गरिमा और आत्मसम्मान को प्रभावित करता है। ‘बलात्कार’ का शिकार हुई महिला के लिए यह ‘शर्म की बात है’ और उसे यह पूरी जिंदगी परेशान करेगा।

कोर्ट ने कहा कि एक औरत के लिए यह एक दर्दनाक अनुभव है और यह औरत की ‘गोपनीयता के अधिकार’ पर आक्रमण है। जस्टिस एम वेणुगोपाल ने कहा कि ‘रेप’ का अपराध पीड़िता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और वास्तविकता में यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में ‘जीवन के अधिकार’ के रूप में वर्णित है।

उन्होंने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए यह बात कही, जिसमें आरोपी को रेप के मामले में दोषी ठहराया गया था। अभियोजन पक्ष ने बताया कि आरोपी दो साल से पीड़िता को जानता था 19 वर्षीय पीड़िता के को वेल्लोर जिले में अराकोनम तालुक में फोन करके बुलाया।

वहां उसने पीड़िता को अगवा कर संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। हालांकि, लड़की ने ऐसा करने से मना कर दिया था। इस दौरान उसने झूठा वादा भी किया कि वह उससे शादी करेगा। इसके बाद उसने पीड़िता से रेप किया और इस बात को किसी से भी नहीं बताने की धमकी दी।

वेल्लोर जिले की महिला कोर्ट ने इस मामले में दोषी पाए गए युवक को सात साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में दोषी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

रेप से होता है ‘जीवन के अधिकार’ का उल्लंघन : मद्रास हाईकोर्ट

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