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बीते आधी शताब्दी से नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवित होने या मृत्यु हो जाने का रहस्य और विवाद जारी है। मथुरा हिंसा के सरगना रामवृक्ष यादव ने भी अपने लाभ के लिए इस विवाद का बेहद शातिराना ढंग से इस्तेमाल किया।

उसने सुभाषचंद्र बोस के नाम से एक पूरा पंथ ही खड़ा कर दिया, जो उनके विचारों के इर्द-गिर्द बताया जाता था, लेकिन उसके पीछे रामवृक्ष का स्वार्थ छिपा था।

रामवृक्ष ने वर्ष 2013 में ‘स्वाधीन भारत’ का गठन किया। जय गुरुदेव के उत्तराधिकार के संघर्ष में जब उसे कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उसने ‘स्वाधीन भारत सुभाष सेना’ बनाकर खुद को एक ऐसे राजनेता के रूप में पेश कर लोगों को बरगलाया जो नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आदर्शों को मानता है।

दरअसल, उत्तराधिकारी बनने की दौड़ में पिछड़ा रामवृक्ष खुद को स्थापित करने के लिए जमीन चाहता था। साल 2013 में ही रामवृक्ष ने ‘भारतीय सुभाष सेना’ बनाई।

उसने दावा किया कि जय गुरुदेव ही सुभाषचंद्र बोस थे और उनकी मृत्यु के बाद भारत सरकार को उनकी पहचान जाहिर करनी चाहिए। उनकी मृत्यु के सर्टिफिकेट पर उनका असली नाम होना चाहिए।

वैसे, जय गुरुदेव को ही नेताजी के रूप में प्रचारित करने का प्रयास उनके जीवनकाल में ही शुरू हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद रामवृक्ष ने इसका जमकर फायदा उठाया।

साल 2006 में इसी सुभाष सेना के कुछ सदस्यों ने दावा किया कि वे सीतापुर में नेताजी से मिले हैं जो अब 109 वर्ष के हैं। उनका इशारा जय गुरुदेव की ओर था।

और जय गुरुदेव के स्वर्गवास के बाद राम वृक्ष ने खुद को उनका उत्तराधिकारी साबित करने के प्रयास में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बनाई आजाद हिंद सरकार की तर्ज पर अपनी ‘आजाद हिंद सरकार’ को स्थापित करने की नीति अपनाई।

 इसके जरिए वह भारत सरकार जिसे उसने ‘अंग्रेज भारत सरकार’ करार दे रखा था, पर दबाव डाल रहा था कि वह बोस से संबंधित विभिन्न दस्तावेज सार्वजनिक करे।

अपने दावे को मजबूती देने के लिए अपने समूह स्वाधीन भारत सुभाष सेना के जरिए उसने ‘स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह’ शुरू किया। इसके जरिए रामवृक्ष ने खुले आम घोषित कर दिया कि यह सत्याग्रह ‘आजाद हिंद सरकार की अंग्रेज भारत सरकार से टक्कर’ है।

11 जनवरी 2014 को इसी सत्याग्रह को उसने मध्यप्रदेश के सागर जिले से शुरू किया और नेताजी की तरह ‘दिल्ली चलो’ नारे को ‘दिल्ली चलो वाया मथुरा’ नाम से देते हुए जत्था लेकर निकला।

विभिन्न प्रदेशों से होते हुए यह जत्था मथुरा पहुंचा और यहां के जवाहर बाग में पहले धरने और फिर कब्जे में बदल गया। यहां उसने जो मांगे उठाई वह एक पीड़ित या अधिकारों के लिए लड़ रहे वर्ग द्वारा सरकार से की जाने वाली मांगें नहीं थीं, बल्कि एक देश द्वारा दूसरे देश से की जाने वाली मांगों जैसी थी।

रामवृक्ष आजाद हिंद बैंक करेंसी को भारतीय मुद्रा के रूप में मान्यता दिलाना चाहता था। उसका दावा था कि इस मुद्रा के एक रुपये में 972 मिलीग्राम सोना खरीदा जा सकता है।

रामवृक्ष और तथाकथित सत्याग्रहियों की मांग थी कि देश से प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अन्य सभी पदों पर चुने या नियुक्त राजनेताओं को हटाया जाए, क्योंकि यह चुनाव अंग्रेज भारतीय सरकार के चुनाव हैं।

इसकी जगह आजाद हिंद सरकार बनाई जाए। उसके भी पहले आजाद हिंद मुद्रा को लागू किया जाए और आरबीआई के मौजूदा भारतीय रुपये को खत्म किया जाए।

इन अव्याहारिक मांगों को मानना किसी के लिए भी संभव नहीं था, यह शायद खुद रामवृक्ष भी जानता था इसलिए उसने मथुरा के जवाहरबाग में अपना धरना जारी रखा।

रामवृक्ष ने कुछ इस तरह किया सुभाष चंद्र बोस के नाम का इस्तेमाल

| उत्तर प्रदेश, लखनऊ | 0 Comments
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