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विधानसभा चुनाव के नतीजे क्या होंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन प्रदेश में भाजपा को छोड़कर कोई भी दल पूरी तरह चुनावी मोड में नहीं आ पाया है। भाजपा ने जहां चुनावी रण में पूरी सेना को झोंक दिया है, वहीं दूसरे दलों के सेनापति अभी रणनीति बनाने में ही जुटे हुए हैं। भाजपा के केंद्रीय मंत्रियों ने सूबे में डेरा डाल रखा है।

भाजपा ने सांसद, विधायक और प्रमुख नेताओं को कई-कई कार्यक्रमों की जिम्मेदारी सौंपी गई है, लेकिन दूसरे दल इक्की-दुक्की रैलियों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

अगले महीने तक भारत निर्वाचन आयोग विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान कर देगा। लोकसभा चुनाव में 73 सीटें जीतने वाली भाजपा के सामने 2014 का प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है। इसी को ध्यान में रखकर भाजपा ने बड़े स्तर पर हाईटेक चुनाव अभियान शुरू किया है। चार परिवर्तन यात्राएं निकल रही हैं।

‘यूपी के मन की बात’ जानने के लिए 75 रथ जिलों में चल रहे हैं। इसके तहत युवा, महिलाओं, किसानों के अलग-अलग सम्मेलन किए जा रहे हैं। 200 पिछड़ा वर्ग सम्मेलन चल रहे हैं। हर जिले, महानगर में युवा सम्मेलन शुरू हो गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार यूपी में सभाएं कर रहे हैं। गाजीपुर और आगरा में रैली करने के बाद मोदी 27 नवंबर को कुशीनगर जा रहे हैं। हर जिले में केंद्रीय मंत्री रथयात्रा का नेतृत्व करने के साथ ही सभाओं को संबोधित कर रहे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर निचले स्तर तक के पदाधिकारी चुनावी तैयारियों में जुटे हैं।

सत्तारूढ़ सपा की चुनावी तैयारियों को गुटबंदी का ग्रहण लग गया है। दो माह तक समाजवादी परिवार में खूब घमासान मचा रहा। सपा के दो प्रमुख नेताओं रामगोपाल यादव को पार्टी और शिवपाल सिंह यादव को सरकार से बाहर होना पड़ा। चुनावी साल में सपा के अंतर्विरोधों के खुलकर सामने आ जाने से उसकी चुनावी तैयारियां पीछे छूट गई हैं। सीएम अखिलेश यादव का समाजवादी विकास रथ रफ्तार नहीं पकड़ पाया। मंडलीय रैलियों का कार्यक्रम तय नहीं हो पाया है। एक दिन की रथयात्रा, रजत जयंती समारोह और गाजीपुर रैली के अलावा सपा चुनाव अभियान को गति देने वाला र्कोई आयोजन नहीं कर सकी।

बसपा सुप्रीमो मायावती कुछ क्षेत्रीय रैलियां और राजधानी में एक बड़ी रैली कर चुकी हैं। अब उनके कमांडर जनता के बीच हैं। सतीशचंद्र मिश्रा और नसीमुद्दीन सिद्दीकी खास तौर से सम्मेलनों में जा रहे हैं। जिला स्तर पर बसपा में सक्रियता तो है लेकिन बहुत हलचल नहीं है। बसपा सुप्रीमो के सघन दौरे शुरू नहीं हुए हैं। मायावती विरोधियों पर बयानों से लगातार हमले कर रही है लेकिन एक्शन में बहुत कुछ नहीं हो पा रहा है।

राहुल गांधी ने देवरिया से दिल्ली तक किसान यात्रा निकालकर कांग्रेस के पक्ष में थोड़ा माहौल बनाया था। किसानों की कर्जमाफी को लेकर लोगों में उत्सुकता थी, राहुल संदेश यात्रा असर नहीं छोड़ पाई है। कांग्रेस के कुछ नेता सक्रिय दिख रहे हैं, लेकिन पार्टी में चुनावी तैयारियों की रफ्तार नजर नहीं आ रही। गठबंधन की अटकलों से भी कांग्रेस के पक्ष में बने माहौल पर असर पड़ा है।

पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में आधार रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल को गठबंधन के लिए नए ठिकाने की तलाश है। फिलहाल जदयू और बीएस-4 से रालोद की दोस्ती हुई है।

कृष्णा पटेल की अगुवाई वाला अपना दल, पीस पार्टी जैसी छोटी पार्टियां भी बड़े दलों से मेल-मिलाप की कोशिशों में लगी हैं।

यूपी चुनाव के लिए सबसे आगे निकली भाजपा, बाकी बना रहे सिर्फ रणनीति

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