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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को लेकर मंदिर प्रबंधन ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि 10 से 50 वर्ष आयुवर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर ही रोक है क्योंकि वे माहवारी के कारण खुद को लगातार 41 दिनों तक पवित्र नहीं रख सकती हैं।

इस पर न्यायाधीशों ने सवाल किया कि माहवारी का पवित्रता से क्या संबंध है? आप पवित्रता के आधार पर भेदभाव करते हैं। क्या संविधान ऐसा करने की अनुमति देता है?” न्यायाधीश वी. गोपाला गौडा और कुरियन जोसेफ की अदालत में बहस बेनतीजा रही। इस पर दो मई को फिर सुनवाई होगी।

मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक पर अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा। बोर्ड के वकील केके वेणुगोपाल ने जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने तर्क दिया कि मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक लैंगिक भेदभाव के कारण नहीं है। इसके पीछे तर्कसंगत कारण है।

वेणुगोपाल ने बताया कि मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं पर रोक है। यह रोक मंदिर में उनके प्रवेश पर नहीं है, बल्कि केवल पहाड़ी की पवित्र चढ़ाई पर है, जो सदियों से चल रही है। यह रोक इसलिए है क्योंकि महिलाएं माहवारी के कारण लगातार 41 दिन पवित्र नहीं रह सकतीं। जबकि मंदिर में प्रवेश से पहले किसी भी भक्त के लिए 41 दिनों का व्रत रखना अनिवार्य है।

माहवारी का महिलाओं की पवित्रता से क्या संबंध – SC

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