सामाजिक एवं जातिगत समीकरणों को साधकर उत्तरप्रदेश में सत्ता के 14 वर्षो के बनवास को खत्म करने में जुटी भाजपा के समक्ष बिहार की तर्ज पर प्रदेश में समाजवादी पार्टी , कांग्रेस का ‘महागठबंधन’ गंभीर चुनौती पेश कर सकता है, ऐसे में इस चुनौती की काट के लिए पार्टी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के आजमाये फॉर्मूले को आगे बढ़ा रही है।

भाजपा इस बार उत्तरप्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग पर ध्यान केंद्रित कर रही है। भाजपा की पहली सूची में इसकी झलक साफ नजर आती है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश चुनावों के मद्देनजर सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए 64 सवर्ण (जिसमें 33 क्षत्रिय और 11 ब्राह्मण), 44 ओबीसी और 26 दलित उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट 19 फीसदी है जो काफी निर्णायक होता है। पिछले चुनाव में सपा के प्रचंड बहुमत में मुस्लिम वोट का हाथ था तो 2007 में मायावती को मिले बहुमत में दलित के साथ ब्राह्मण वोट का मेल महत्वपूर्ण था।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, पिछले दिनों सपा में छिड़े घमासान से मुस्लिम मतदाता थोड़ा संशय में था। सपा के लिए गठबंधन इसलिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि उसे आशंका थी कि कमजोर सपा के साथ मुस्लिम मतदाता नहीं खड़ा होना चाहता। सपा और कांग्रेस के महागठबंधन के बाद भाजपा को उम्मीद है कि बसपा और महागठबंधन के बीच मुस्लिम मतों के विभाजन का उसे लाभ मिलेगा।

समाजवादी पार्टी में मचे घमासान के शांत होने के बाद अखिलेश यादव के हाथों में पार्टी की बागडोर आने और कांग्रेस के साथ महागठबंधन को आगे बढ़ाने की पहल भाजपा के लिए चुनौती पेश कर रही है। पार्टी इस बार अपने वोटबैंक के आधार सवर्ण के अलावा ओबीसी और दलित वोटबैंक में सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रही है। टिकट भी उन्हें ही दिया जा रहा है जिनके जीतने की प्रबल संभावना हो।

‘महागठबंधन’ की चुनौती की काट के लिए भाजपा की ‘सोशल इंजीनियरिंग’

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