उत्तराखंड में नए जिलों के गठन के मुद्दे पर सियासी रंग चढ़ाने की शुरूआत भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार ने की। चुनाव से पहले जारी एक शासनादेश से खुद को नए जिलों का जनक साबित करने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। जब भी जिलों का मुद्दा उठा तो भाजपा उस शासनादेश का हवाला देकर श्रेय लेने की होड़ में दिखी। यह अलग बात है कि महज शासनादेश से कभी जिलों का गठन नहीं होता है।

जब भी नये जिलों के गठन की बात उठती भाजपा की छटपटाहट बढ़ने लगती है। भाजपा जानती है कि अगर सरकार चुनाव से ऐन पहले जिलों का गठन करती है तो उसका सियासी लाभ चुनाव में कांग्रेस को जा सकती है। ऐसे में नए जिलों के गठन की रेस में वह पिछड़ना नहीं चाहते। पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल निशंक ने वर्ष 2011 में एक शासनादेश जारी कर रानीखेत, डीडीहाट, यमुनोत्री व कोटद्वार को जिला बनाया जाना प्रस्तावित किया था।

हालांकि उनके इस फैसलों को पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी ने आगे नहीं बढ़ाया। जानकारों की माने तो एक जिले के गठन में लगभग चार सौ करोड़ का अतिरिक्त राजस्व जुटाना होता है। ऐसे में चार जिलों के लिए 1500 करोड़ का प्रावधान होना चाहिए। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट सीएम रावत के फैसले को चुनावी दांव बता रहे हैं। वे बोले कार्पस फंड जैसी व्यवस्था से जिले नहीं बनते।

भाजपा ने रखी सियासी प्रतिस्पर्धा की नींव

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