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जवाहर बाग कहने के लिए जंगल था, लेकिन अंदर बसा था पूरा शहर। ऐसा शहर जिसमें आटा चक्की, राशन डिपो, सब्जी मंडी, सैलून, ब्यूटी पार्लर समेत तमाम सुविधाएं थीं। खुद को गरीब-मजदूर बताने वाले कब्जाधारियों के पास बाइक, स्कूटर और लग्जरी गाड़ियां भी थीं।

सरकार ने बिजली काटी, तो पूरा सोलर सिस्टम लगा लिया। उद्यान विभाग के कुए और ट्यूबवेल कब्जा लिए। जवाहरबाग खाली हुआ तो वहां राख के ढेर ही ढेर नजर आए। इनके बीच ही कहीं फुंका हुआ टीवी पड़ा था, कहीं कूलर के अवशेष थे।

रसोई गैस के सिलेंडर भी थे और बाइक के पुर्जे थे। मिट्टी के कच्चे घर थे। छतों की जगह छप्पर थे। लेकिन सुविधाएं तमाम थीं। ट्रकों में सामान आता था। सोलर सिस्टम से टीवी चलाए जाते थे। लाउडस्पीकर गूंजते थे।

उद्यान विभाग के ट्यूबवेल से पाइप लाइन डाली गई जो घरों तक जाती थी। 280 एकड़ का जवाहर बाग  एक छोटी रियासत बन गया था और इसका मालिक था रामवृक्ष यादव। उसने दो दिन के लिए प्रशासन से बाग में प्रवास की अनुमति मांगी थी लेकिन इसे खाली नहीं किया। यह खाली हुआ ढाई साल बाद। वो भी तब जब गोलियां चलीं और 27 लाशें बिछ गई।

पुलिस ने जवाहर बाग खाली कराने केबाद सर्च आपरेशन चलाया। यहां हथियारों का जखीरा मिला। अधबने हथियार भी मिले। तमंचों की नाले थीं, पाइप थे। माना जा रहा है कि अंदर ही हथियारों का कारखाना चल रहा था।

बिजली काटी, तो पूरा सोलर सिस्टम लगा लिया

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