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‘19 फरवरी 2015 की रात हत्या के मुजरिम लाल सिंह उर्फ लालू की फरारी में जेल प्रशासन का कोई कसूर नहीं था। जेल का पूरा अमला तो चुस्त दुरुस्त था और सारे बंदोबस्त भी चौकस थे। दरअसल पूरा कसूर लालू का ही था। जो अपने हुनर के बूते जेल की दीवार कूदकर भाग गया था…।’

लालू फरारी प्रकरण में जेल प्रशासन के खिलाफ बैठी जांच का रिजल्ट कुछ ऐसा ही साबित कर रहा है। जांच में जेल प्रशासन को क्लीन चिट दे दी गई है। मामले में सस्पेंड किए गए तीनों बंदी रक्षक भी खामोशी से बहाल किए जा चुके हैं। बस एक बंदी रक्षक की शिथिलता मानी गई है, लेकिन बहाल वो भी हो चुका है।

संभल के गांव पंवासा निवासी लाल सिंह उर्फ लालू संभल के मेडिकल स्टोर संचालक के नौकर की हत्या में करीब सात साल से जेल में है। उसे अदालत से उम्रकैद की सजा भी हो चुकी है। जेल अफसरों की आंखों में धूल झोंककर जिस तरह लालू जेल की दीवार कूदकर फरार हुआ था उससे कइयों पर गाज गिरना तय माना जा रहा था। लेकिन खानापूरी करके पूरे मामले को दफन कर दिया गया है। जेल प्रशासन को क्लीन चिट के साथ जांच फाइल बंद कर दी गई है।

दीवार फांदकर जेल से बंदी लाल सिंह उर्फ लालू की फरारी के मामले में सस्पेंड किए गए बंदी रक्षक मनमोहन सारस्वत और कैलाश को जांच में निर्दोष पाए जाने के बाद बहाल किया जा चुका है। विभागीय जांच में ये निर्दोष निकले हैं। बैरक ड्यूटी पर तैनात बंदी रक्षक दीपक की कुछ स्थिलता जरूर उजागर हुई थी, लेकिन विभागीय जांच निपटने के साथ उसे भी बहाल किया जा चुका है। दीपक की स्थिलता को छोड़ दें तो मजिस्ट्रेटियल जांच में भी जेल प्रशासन को क्लीन चिट दी जा चुकी है।
बीआर वर्मा, सीनियर जेल सुपरिंटेंडेंट।

बंदी हुनरमंद था तो भाग गया.. स्टाफ का क्या दोष

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