चुनाव आयोग ने बुधवार को उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण साबित होने जा रहे विधानसभा चुनाव दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए ही नहीं विपक्ष के लिए भी अग्निपरीक्षा साबित होंगे। चुनावी नतीजे नोटबंदी पर पहली बार जनमानस का रुख सामने लाएंगे। इसके अलावा नतीजे यह भी बताएंगे कि भविष्य की केंद्रीय राजनीति में भाजपा विरोधी मोर्चे की कितनी गुंजाइश बाकी है।

विभिन्न चुनावी राज्यों के अलग-अलग सियासी समीकरण होने के कारण मुकाबला बेहद दिलचस्प होगा। खास बात यह है कि चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो जाने के बावजूद विभिन्न राज्यों में कई दलों ने अपने उम्मीदवार तक घोषित नहीं किए हैं। हालांकि भाजपा की ओर से यह तय है कि इन सभी राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही पार्टी का चेहरा होंगे।

साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद यह पहला मौका है जब एक साथ पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इससे पहले विभिन्न राज्यों में हुए चुनाव के नतीजे से मोदी सरकार के संदर्भ में मिला-जुला संदेश ही सामने आया। मसलन लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद हुए महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा में भाजपा ने सियासी बाजी मारी। जबकि साल 2015 की शुरुआत में दिल्ली और अंत में बिहार में पार्टी ने करारी शिकस्त खाई। हालांकि बीते साल असम में चुनाव जीत कर भाजपा पूर्वोत्तर में पहली बार कमल खिलाने में कामयाब रही।

उत्तर प्रदेश की उलझन
सियासी रूप से देश के इस सबसे महत्वपूर्ण सूबे में दो फाड़ हो चुकी सपा ने सभी दलों को बुरी तरह उलझा दिया है। उम्मीदवार और रणनीति को अंतिम रूप देने से पहले भाजपा, कांग्रेस, रालोद जैसे दल सपा में जारी संघर्ष के हश्र का इंतजार कर रहे हैं। क्या दो फाड़ हो चुकी सपा में अब भी सुलह की गुंजाइश बाकी है?

क्या सपा का अखिलेश और मुलायम खेमा अलग-अलग चुनावी ताल ठोकेगा? विरोधी दल इस यक्ष प्रश्न के जवाब का इंतजार कर रहे हैं। कांग्रेस और रालोद ने मुख्यमंत्री अखिलेश खेमा से चुनाव पूर्व गठबंधन की संभावना के कारण चुप्पी साध रखी है। जबकि भाजपा उम्मीदवार घोषित करने से पहले सभी संभावनाओं के मूर्तरूप ले लेने का इंतजार कर रही है।
उत्तराखंड की जंग

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रपति शासन, फिर रावत सरकार की बहाली का सियासी ड्रामा देख चुके इस सूबे की तस्वीर भी साफ होनी बाकी है। राज्य के मुख्यमंत्री हरीश रावत जहां अपनी सरकार की उपलब्धियों और सरकार की बर्खास्तगी को मुद्दा बनाएंगे। वहीं भाजपा सैनिक बहुल इस राज्य में वन रैंक वन पेंशन को मुद्दा बनाएगी।

रावत के सामने जहां पार्टी को अपने दम पर चुनावी वैतरणी पार कराने की चुनौती होगी, वहीं भाजपा के सामने अपने दिग्गज और वरिष्ठ नेताओं को साधने के अलावा कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए विधायकों का भविष्य सुनिश्चित करने की चुनौती होगी। इन विधायकों को टिकट देने पर पार्टी को विद्रोह का सामना करना पड़ सकता है।

गोवा में नया समीकरण
सालों से कांग्रेस बनाम भाजपा की जंग का गवाह रहे इस सूबे में इस बार आम आदमी पार्टी के अलावा संघ से विद्रोह कर नए दल के सहारे चुनाव मैदान में कूदने वाले सुभाष वेलिंगकर ने सियासी समीकरण को उलझा दिया है। भाजपा के पास इस चुनाव में रक्षा मंत्री मनोहर परिकर जैसा चेहरा नहीं है। मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर गुटबाजी को सुलझा नहीं पा रहे। कांग्रेस में भी आतंरिक कलह अरसे से जारी है। ऐसे में दो नए दलों के आगमन ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है।

पंजाब में भी नया विकल्प
गोवा की तरह पंजाब में भी बैंस बंधुओं की नई पार्टी, आम आदमी पार्टी की मजबूत दस्तक और पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्घू के कांग्रेस का दामन थाम लेने से एक नई सियासी परिस्थिति पैदा हो गई है।  यहां सत्तारूढ़ अकाली दल-भाजपा के सामने दस साल की सत्ता के बचाए रखने तो कांग्रेस के पास वापसी करने की चुनौती है। ऐसे में मतदाताओं के समक्ष आप के रूप में मौजूद विकल्प ने स्थिति उलझा दी है।

असम के बाद मणिपुर?
बीते साल असम में कमल खिला कर पूर्वोत्तर के लिए महत्वपूर्ण सियासी रास्ता बनाने वाली भाजपा की निगाहें अब मणिपुर पर है। पार्टी लोकसभा चुनाव के बाद से ही पूर्वोत्तर के राज्यों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है।

 

नोटबंदी पर जनादेश साबित होंगे विधानसभा चुनाव के नतीजे, विपक्ष की भी अग्निपरीक्षा

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