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केंद्र पर प्रदेश का रेग्युलर बजट कैद करने के आरोप के साथ प्रदेश में कोई नई योजना शुरू न कर पाने और विधायकों को पैसा देने में असमर्थता जताकर मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भाजपा को फिर कटघरे में खड़ा किया है।

राजनीतिक रणनीतिकार इसे मुख्यमंत्री रावत का सोचा-समझा दांव बताकर विधानसभा जल्दी ही भंग होने का संकेत मान रहे हैं। उनका मानना है कि सीएम के 10 महीने सरकार चलाने के उद्देश्य को बट्टा लग रहा है। इससे भाजपा पर सारा ठीकरा फोड़ मुख्यमंत्री रावत चुनाव में जा सकते हैं।

विधानसभा बजट सत्र के दौरान भी सदन में मुख्यमंत्री रावत ने विपक्ष के विकास कार्य संबंधी हर हमले से बचने के लिए केंद्र के बजट न जारी करने को ढाल बनाया था। इस पर नेता प्रतिपक्ष और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट केंद्र से मिली धनराशि का आंकड़ा सदन में लहराते रहे। फ्लोर टेस्ट के बाद जब चुनाव में जाने की बात आई तो मुख्यमंत्री ने 10 महीने सरकार चलाने का निर्णय लिया।

रणनीतिकारों का मानना है कि बिना बजट के 10 महीने सरकार चलाने में मुख्यमंत्री रावत का उद्देश्य पूरा होता नहीं आ रहा है। केंद्र से मिला धन जून तक ही चल पाएगा। जुलाई में फिर बजट की दिक्कत सामने आएगी, चूंकि अब प्रदेश में सरकार है
तो केंद्र से त्रैमास बजट भी नहीं मिलना है।

ऐसी स्थिति में न तो कोई योजना आगे बढ़ पाएगी और न ही कांग्रेस सरकार के चुनावी एजेंडे की योजनाएं शुरू हो सकती हैं।

इन हालात में रावत बजट के बहाने सारा ठीकरा भाजपा पर फोड़ जल्दी ही चुनाव में जा सकते हैं। इससे कांग्रेस सरकार को बहुत सी योजनाएं शुरू न कर पाने का बहाना भी मिल जाएगा।

तो क्या उत्तराखंड में समय से पहले हो सकते हैं चुनाव?

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