clinical_trials_19_08_2016

भारत में क्लीनिकल ट्रायल करना अब और आसान हो गया। ट्रायल करने के लिए अब न तो 50 बेड के अस्पताल की जरूरत है और न ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) से अनापत्ति सर्टीफिकेट (एनओसी) की।

इससे जिला अस्पताल व प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में भी ड्रग ट्रायल हो सकेगा। इतना ही नहीं, एक साथ अधिक से अधिक तीन क्लीनिकल ट्रायल का बंधन भी खत्म कर दिया गया है। अब क्लीनिकल ट्रायल करने वाले संस्थान की इथिक्स कमेटी ही ये सब निर्णय लेगी। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) ने इसके लिए हाल ही में निर्देश जारी किए हैं।

नियम उदार करने के पीछे डीसीजीआई का तर्क है कि इससे देश में नए मालीक्यलू (दवा) की खोज होगी। इसका फायदा मरीजों को होगा। नई-नई बीमारियों से निजात दिलाने की अच्छी दवाएं बाजार में आ सकेंगी। कई बीमारियों की दवाओं पर रिसर्च नहीं हो रही है, इससे इनकी दवाओं की भी खोज हो सकेगी। उधर, हेल्थ एक्टिविस्ट्स का कहना है कि फार्मा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए ढिलाई की गई है।

प्रदेश में ड्रग ट्रायल मामले का खुलासा करने वाले हेल्थ एक्टिविस्ट अमूल्य निधि ने कहा कि 2005 से 2013 के बीच क्लीनिकल ट्रायल पर सही नियंत्रण नहीं था। इस कारण से इन 8 सालों में देशभर में करीब 5 हजार लोगों की मौत हो गई, जबकि 12 हजार पर दवाओं का उल्टा असर पड़ा।

उन्होंने कहा कि इथिक्स कमेटी ने ट्रायल को मंजूरी दे दी, लेकिन मरीज को दवा का विपरीत असर हुआ तो कौन जिम्मेदार होगा। अमूल्य निधि ने बताया कि मध्य प्रदेश में अवैध तरीके से ड्रग ट्रायल का खुलासा होने के बाद 2011 में स्वास्थ्य अधिकार मंच ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन शर्तों के साथ ट्रायल की अनुमति दी। पहला ट्रायल से फायदा-नुकसान क्या है। दूसरा ट्रायल से कोई नई दवा मिल सकती हो और तीसरा यह कि उसी मर्ज की दवा का ट्रायल हो जो बीमारी भारत में होती है।

मप्र में है ट्रायल पर प्रतिबंध

प्रदेश सरकार ने ड्रग ट्रायल पर 2012 से प्रतिबंध लगा रखा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय शर्तों के अनुसार भी प्रदेश में ट्रायल नहीं हो रहा है। मलेरिया व सिकलसेल एनीमिया की दवा के ट्रायल के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के जबलपुर स्थित केन्द्र को मंजूरी मिली थी, लेकिन सरकार से अनुमति नहीं मिलने की वजह से ट्रायल नहीं हो सका। जिस संस्थान में क्लीनिकल ट्रायल किया जाता है वहां पहले इथिक्स कमेटी बनाना होती है। इसमें संस्थान के लोगों के अलावा एक विधि विशेषज्ञ, मरीज के प्रतिनिधि के तौर पर सामाजिक कार्यकता, विषय विशेषज्ञ होते हैं।

छोटे अस्पतालों में भी होगा क्लीनिकल ट्रायल

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