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नई दिल्ली। ”बिहार में बहार है” इस नारे के साथ नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव पूर्ण बहुमत से बिहार की गद्दी पर काबिज हुए। चुनावों में उन्होंने दलित हित की बात की। उन्होंने आरक्षण को बचाए रखने की बात की लेकिन बुधवार को पुलिसिया कार्रवाई ने सारी पोल खोल दी। छात्रवृत्ति में कटौती का विरोध कर रहे छात्रों पर जब पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं तो लोगों की सारी उम्मीदें इस सरकार से चकनाचूर हो गईं। लोग इस मामले पर सवाल उठाने लगे।

क्या नीतीश कुमार बिहार को गुजरात के रास्ते पर ले जाना चाह रहे हैं..? वे गुजरात का मतलब समझ रहे हैं न…! आज का गुजरात, जहां के महज लगभग सात फीसद दलितों ने समूचे आरएसएस की नाक में नाथ डाल के उंगलियों में घुमाना शुरू कर दिया है…!

 

क्या मांग थी नीतीश बाबू..? महज यही न… कि दलितों और आदिवासियों की स्कॉलरशिप पर डाका डाल कर उनका गला काटा जाए..! बस इतने के लिए क्या वे इस बर्बर अत्याचार के हकदार थे? आपकी सरकार की पुलिस गुजरात के ऊना के उन गो-गुंडों से कितनी अलग है जिन्होंने महज गाय की खाल उतारने के एवज दलित युवकों को इसी तरह पीटा था? 
लेकिन जो नीतीश कुमार संघी पाए पर टिके सरकारी तौर पर ‘गंगा आरती’ का आयोजन शुरू कराते हैं, रणवीर सेना की बर्बरताओं की खाल उतार देने वाले अमीरदास आयोग को भंग कर देते हैं, लक्ष्मणपुर बाथे या बथानी टोला के कातिलों को हाईकोर्ट से छूट जाने पर बहुत अफसोस में नहीं जाते हैं, तमाम जन-आंदोलनों से निपटने के लिए सिर्फ पुलिस की लाठी का सहारा लेना जानते हैं, उस नीतीश कुमार से बहुत उम्मीद करना शायद बेमानी है..!
अब उनकी पुलिस की बर्बरता से ‘दुखी’ होकर संघियों-भाजपाइयों के कुनबे फिर कूं-कूं करने लगे हैं तो इसका मौका उन्होंने ही दिया है..! अभी तक हमने इस मोर्चे पर लालू को इस शक्ल में नहीं देखा है। अब देखना है कि दलित विद्यार्थियों पर ढाए गए कहर पर वे क्या कहते हैं और कब कहते हैं…!

 

कहीं ऐसा हो कि ऊना से चली हवा गुजरात से पार दूसरी जगहों को भी अपनी जद में ले ले..! इसलिए संभालिए और बचाइए बिहार को नीतीश बाबू..! तूफान झोपड़ी नहीं देखता, लेकिन इमारतों की खिड़कियां भी खुली रखने की छूट नहीं देता…!

 

 

 

 

 

क्या नीतीश कुमार बिहार को गुजरात के रास्ते पर ले जाना चाह रहे हैं….

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