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उत्तराखंड संकट पर न्यायालय के रुख को देखते हुए केंद्र सरकार को भी अपनी गलतियों का अहसास होने लगा है। सियासी फजीहत झेलने के बाद केंद्र सरकार अब उत्तराखंड मामले को ज्यादा तूल देने के मूड में नहीं है। सरकार के रणनीतिकार भी अब कहने लगे हैं कि मामले का समाधान विधानसभा में शक्ति परीक्षण के जरिए ही होगा।

एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री के अनुसार उत्तराखंड का मामला शक्ति परीक्षण के जरिए ही तय होगा। साथ ही सरकार के रणनीतिकारों ने यह तय किया है कि वे उत्तराखंड के सियासी संकट में अपने हाथ और नहीं जलाएंगे। शक्ति परीक्षण में हरीश रावत की सरकार जीते या हारे भाजपा अपनी ओर से सरकार बनाने का दावा नहीं करेगी। 27 अप्रैल को आने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उसे बेसब्री से इंतजार है।

सरकार को भी लग रहा है कि न्यायालय से उसे ज्यादा राहत नहीं मिलेगी। कांग्रेस के 9 बागी विधायकों की सदस्यता के मामले में ही उसे राहत मिल सकती है। इसलिए सरकार के रणनीतिकार भी विधानसभा में शक्ति परीक्षण के जरिए मामले के हल की मनोदशा बना रहे हैं।

यही वजह है कि सरकार ने उत्तराखंड में लागू राष्ट्रपति शासन को संसद की मंजूरी दिलाने के लिए मामले को दोनों सदनों में सोमवार को पेश तो कर दिया है, लेकिन इसे संसद की मंजूरी दिलवाने के लिए सरकार के रणनीतिकार प्रयासरत नहीं हैं।

सरकार ने उत्तराखंड विनियोग अध्यादेश को भी संसद की मंजूरी के लिए सदन में पेश कर दिया है। एक दूसरे वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री के अनुसार न्यायालय का फैसला आने के बाद ही मामले को देखेंगे। सर्वोच्च न्यायालय के रुख की ओर इशारा करते हुए मंत्री ने कहा कि हो सकता है कि राष्ट्रपति शासन के फैसले को संसद से पारित करवाने की जरूरत ही न पड़े।

केंद्र को भी सताने लगा गलतियों का अहसास

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