भाजपा के लिए ‘करो या मरो’ वाले यूपी के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नए कोण से रोशनी पड़ रही है। राजनेता के बजाय उनका व्यक्ति सामने आ गया है जिसकी खीज, झल्लाहट और आक्रामकता छिपाए नहीं छिप रही है। नतीजा यह हुआ है कि उनके निशाने लगातार चूक रहे हैं, वे भूकंप जैसी आपदा को भी विरोधियों पर हमले के लिए अचानक हाथ लग गए हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं जिसका लिहाज संवैधानिक पदों पर बैठने वाले हर हाल में करते आए हैं। वे इससे भी आगे बढ़कर विपक्ष को धमकाने लगे हैं।
बॉडी लैंग्वेज

नोटबंदी की अवधि समाप्त होने पर गए साल के आखिरी दिन देश के नाम संबोधन में दिखने लगा था कि प्रधानमंत्री के भाषण से रवानी लुप्त हो गई है और उनकी बॉडी लैंग्वेज बदल चुकी है। इसका कारण यह था कि सरकार की कुव्यवस्था से जनता को दो महीने तक हुई परेशानियों को कुर्बानी और अर्थव्यवस्था की तबाही को तरक्की बताते हुए वे अपने भीतर संघर्ष कर रहे थे।

वे एक अधकचरे फैसले के परिणाम स्वरूप हुए भयानक अनुभवों की चमक का बयान कर रहे थे।

 

‘किसी डिग्री कॉलेज के छात्रनेता की तरह बोलने लगे हैं नरेंद्र मोदी’

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