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नई दिल्ली। मिशन कश्मीर के आखिरी दिन गृहमंत्री राजनाथ सिंह और सीएम महबूबा मुफ्ती ने एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की। गृहमंत्री ने कहा कि उन्होंने 20 प्रतिनिधमंडल से बातचीत की। सभी लोगों ने एकसुर में कहा कि धरती की जन्नत कश्मीर में आम लोग शांति चाहते हैं।

राजनाथ सिंह ने कहा कि वो पहले भी कह चुके हैं कि कश्मीर के युवाओं के हाथ में कलम, किताब और कंप्यूटर की जरूरत है। उनके हाथों में बंदूक और पत्थर नहीं होने चाहिए। कुछ लोग युवाओं को गुमराह कर रहे हैं जिन्हें चिन्हित करने की आवश्यकता है।

जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती ने कहा कि राज्य की 95 फीसद आबादी शांति चाहती है। कुछ लोग हिंसा के रास्ते पर चल रहे हैं।

इससे पहले बुधवार को उनसे राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम लोगों ने भी मुलाकात की। गृहमंत्री ने स्पष्ट संदेश दिया कि केंद्र सरकार संविधान के दायरे में बातचीत करने को तैयार है। सरकार आम कश्मीरियों के सुख-दुख में बराबर की भागीदार है, लेकिन हिंसा की इजाजत नहीं दी जा सकती है। गृहमंत्री का ये बयान ट्विटर पर भी सुर्खियां बटोर रहा है।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के कश्मीर दौरे का गुरुवार को दूसरा दिन है और वे यहां सिविल सोसाइटी के नुमाइंदों से मुलाकात कर रहे हैं। इससे पहले बुधवार को राजनाथ सिंह ने राज्य के कई दलों के नेताओं से मुलाकात की थी। राजनाथ से मिलने कांग्रेस, पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस का प्रतिनिधिमंडल पहुंचा था।

इधर, घाटी में कर्फ्यू का सिलसिला जारी है। हिंसा का दौर खत्म नहीं हो रहा है। राज्य और केंद्र सरकार के बीच तालमेल भी नहीं दिख रहा है। राजनाथ का स्वागत करने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती भी एयरपोर्ट पर नजर नहीं आई। पीडीपी इस बात से भी नाराज है कि प्रधानमंत्री की ओर से शांति की पहल तब हुई जब घाटी के विपक्ष के नेता उनसे मिले। जबकि पीडीपी के कहने पर केंद्र सरकार ने ध्यान नहीं दिया। अब दोनों की साझा सरकार के सामने आपसी भरोसा बहाल करने की भी चुनौती है।

बताया जा रहा है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह की वापसी के बाद केंद्र जम्मू-कश्मीर को लेकर फैसला करेगा। हालात न सुधरने पर केंद्र सरकार कदम उठा सकती है। मोदी सरकार राज्य सरकार के कदमों की समीक्षा होगी। केंद्र अब ज्यादा इंतजार करने के पक्ष में नहीं है। हालात नहीं सुधरने पर केंद्र अपने हाथों में कमान ले सकता है।

उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, केंद्र के सामने ये भी विकल्प हैं, इनमें एक विकल्प वहां पर राज्यपाल शासन लगाना भी हो सकता है। राज्यपाल को बदलना भी एक विकल्प है जिस पर विचार किया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का आकलन है कि दक्षिणी कश्मीर में जिन राजनीतिक दलों का जनाधार है उनके वहां हस्तक्षेप करने से हालात काबू में आ सकते हैं। ऐसे में इन दलों से ये अपेक्षा की जा रही है कि वो अपनी ओर से पहल करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ राज्य के विपक्षी दलों के नेताओं की मुलाकात को इस दिशा में काफी सकारात्मक पहल माना जा रहा है।

कश्मीर के बिना अधूरा है शेष भारत का भविष्यः राजनाथ सिंह

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