नई दिल्ली । ब्रेन ट्यूमर की बीमारी से पीड़ित बिहार से जल्द इलाज की उम्मीद लेकर एम्स पहुंची। उसकी यह उम्मीद एम्स पहुंचकर टूट गई। यहां उसे ऑपरेशन के लिए तीन साल बाद का समय दे दिया गया। पीड़ित वृद्धा के परिजनों का सवाल है कि ऑपरेशन नहीं हुआ तो तब तक वह जीवित रह पाएगी?  उस बुजुर्ग महिला का इलाज करने वाले डॉक्टर का कहना है कि संस्थान में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं। मरीजों की तुलना में संसाधनों की भारी कमी है। ऐसे में बीमारी की गंभीरता के आधार पर ऑपरेशन के लिए मरीजों की प्रमुखता तय करनी पड़ती है। इस दलील के बावजूद यह सच्चाई है कि एम्स में न्यूरो व हृदय की बीमारियों की सर्जरी के लिए मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है।

पीड़ित बुजुर्ग महिला के पुत्र गुलाब ने कहा कि करीब डेढ़ महीने हो गए एम्स में इलाज के लिए चक्कर काटते। ओपीडी में दिखाने पर डॉक्टरों ने मरीजों की भीड़ होने की बात कह कर निजी लैब में जांच कराने की सलाह दी। डॉक्टरों की सलाह पर कई जांच निजी लैब में कराई, जिसमें एमआरआई जांच शामिल है।

गांव में जमीन बेचकर इलाज के लिए पैसे लाया था। वह भी खर्च हो गए। उसने कहा कि निजी लैब में जांच कराने के बाद अब एम्स ने ऑपरेशन के लिए अस्पताल में भर्ती होने का समय 20 फरवरी 2020 का दिया और 31,970 रुपये जमा कराने की बात कही। यह समय मिलने के बाद हम इलाज करने वाले डॉक्टर के दफ्तर में गए।

वहां मौजूद जूनियर डॉक्टर से अपना दर्द सुनाया और कहा कि यदि सर्जरी नहीं हुई तो वह वर्ष 2020 तक वह जीवित रह पाएगी। इतना कहते ही हमें दुत्कार कर बाहर निकाल दिया गया।

एम्स पहुंचकर टूट गई उम्मीद ऑपरेशन के लिए तीन साल का समय दिया

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