terrorism-nctc_17_10_2016

नई दिल्ली। मोदी सरकार ने नेशनल काउंटर-टेरेरिज्म सेंटर (NCTC) बनाने के यूपीए सरकार के प्रस्ताव पर फिर से विचार करने की बात कही है। ऐसे में विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि सरकार संविधान में संशोधन करते सामान्य कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों और आतंकवाद व साइबर अपराध जैसे राष्ट्रीय मसलों को अलग-अलग करना होगा।

इसके बिना NCTC को सफलता नहीं मिलेगी, जिसके गठन का प्रस्ताव आतंकवाद से बेहतर तरीके से निपटने के लिए किया गाया था। विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकवाद जैसे गंभीर मसले को केंद्रीय या फिर समवर्ती सूची में रखना जरूरी है।

पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लै ने कहा कि राज्यों के साथ मिलकर इस बारे में एक राष्ट्रीय बहस शुरू करनी चाहिए। इसका मकसद सरकार और प्रशासन कानून व्यवस्था को जैसे देखता है, उस नजरिए में बदलाव लाना है। मगर, कई मुख्यमंत्री यह कहते हुए विरोध कर रहे हैं कि NCTC द्वारा देशभर में कहीं भी संदिग्धों की तलाश करने और उन्हें गिरफ्तार किए जाने से उनके अधिकारक्षेत्र में दखलंदाजी होगी।

ऐसे में मुख्यमंत्रियों को विश्वास में लिया जाना जरूरी है। उन्हें यह बताना जरूरी है कि डकैती, उत्पीड़न, बलात्कार और यातायात नियमों के उल्लंघन जैसे अपराध NCTC के दायरे में नहीं आएंगे। आतंकवाद और साइबर अपराध जैसे गंभीर अपराध राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित हैं और उन्हें राज्य की पुलिस अकेले नहीं संभाल सकती है क्योंकि आतंकवाद और साइबर क्राइम जैसे मामले एक से अधिक राज्यों व देशों के साथ जुड़े होते हैं।

पिल्लै के मुताबिक, GST की तर्ज पर NCTC के लिए भी राज्यों के गृह मंत्रियों द्वारा एक काउंसिल गठित की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्रियों को यह स्वीकार करना चाहिए कि आतंवाद और साइबर क्राइम जैसे अपराधों से निपटने में उनकी पुलिस सक्षम नहीं है। इस तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए एक केंद्रीय एजेंसी की जरूरत होगी।

 

 

आतंकवाद से निपटने के लिए NCTC का गठन जरूरी

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