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पाकिस्तान के कितने चेहरे हैं। शायद उसे भी पता न हो। कभी वो अपने आपको दहशतगर्दी से पीड़ित देश बताता है। तो कभी वो आतंक के खिलाफ लड़ाई में अपने आप को अगुवा बताने की कोशिश करता है। लेकिन अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा अभिलेखागार से सर्वाजनिक हुए दस्तावेजों से पता चलता है कि जो हाथ उसे मदद करते हैं, वो उन्हीं हाथों को वो काटने में लगा हुआ है।

दस्तावेजों से जो जानकारी सामने आयी है। उसके मुताबिक अमेरिकी मदद को आईएसआई के लिए काम करने वाले हक्कानी नेटवर्क को अभी भी दिया जाता है। जबकि साल 2009 में अमेरिकी मदद के एक हिस्से यानि करीब 2 लाख डॉलर का इस्तेमाल सीआईए कैंप पर हमले के लिए हक्कानी नेटवर्क को दिया गया था।

मामला 2009 में अफगानिस्तान-पाक सीमा के पास सीआईए के छम्मन कैंप का है। सीआईए के कैंप पर हुए हमले में सात अमेरिकी एजेंट और कॉन्ट्रैक्टर समेत 10 लोग मारे गए थे। आतंकी हमले को खलील-अबु-मुल-अल -बलावी नाम के जार्डन के एक डॉक्टर और सीआईए के लिए काम कर रहे एजेंट ने अंजाम दिया था। बताया जाता है कि अल कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन और अल जवाहिरी के खात्मे के लिए वो एजेंट काम कर रहा था।

छम्मन पोस्ट के जरिए पाकिस्तान में ड्रोन विमानों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी। लेकिन पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने वाले हक्कानी ग्रुप ने एजेंट को अपनी तरफ मिला लिया ।जिसने सीआईए कैंप पर आत्मघाती हमला करने में मदद की। सीआईए कैंप के इस हमले को डॉर्क जीरो थर्टी में दिखाया भी गया है।

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, सीआईए पोस्ट पर हमले के करीब आठ साल बाद तक इन दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं किया गया था। लेकिन, अब दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों पर असर पड़ना तय है।

अमेरिकी मदद से ही ISI ने करवाया था CIA कैंप पर हमला

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