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देश में समान नागरिक संहिता और तीन तलाक मामले से जुड़ी चर्चाएं फिर सुर्खियों में हैं। देश का एक धड़ा चाहता है कि संविधान को ध्यान में रखते हुए ‘एक देश-एक कानून” लागू किया जाए। उधर, मुस्लिम समुदाय की प्रगतिशील महिलाएं तीन तलाक प्रथा को लेकर न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा रही हैं।

मगर, ये बात कम ही लोगों को पता है कि मुस्लिम समाज की परंपराओं में समय के साथ बदलाव लाने की मांग से अंग्रेज भी पीछे हट गए थे। दरअसल, अंग्रेज चाहते थे कि भारत सहित दुनियाभर के मुस्लिमों से उनका कोई बिगाड़ न हो, इसलिए उन्होंने इन मामलों को सुलझाने का प्रयत्न करने के बजाय हाथ पीछे खींच लिए।

किस्सा आजादी के पहले का है, जब भारत में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग द्वारा की जा रही अलग मुल्क की मांग चरम पर थी। उस दौरान एक साथ कई मसलों- मुद्दों पर देश में राय बन-बिगड़ रही थी। तबकई प्रगतिशील मुस्लिमों ने तीन तलाक के मुद्दे पर अपनी राय रखी।

बाद में, एक देश में सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून की बात भी उठी। तब अंग्रेज नियम बनाते और उन्हें सख्ती से लागू भी करवाते थे। मगर, अंग्रेज मुस्लिम लीग से बिगाड़ नहीं चाहते थे। नतीजतन, इस मुद्दे पर निर्णायक होने के बजाय अंग्रेज पीछे हट गए और मामला ठंडा पड़ गया।

 

अंग्रेज भी नहीं बदल पाए ट्रिपल तलाक का सिस्टम

| उत्तर प्रदेश | 0 Comments
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